देवीपाटन मंदिर परिक्षेत्र में प्रस्तावित फोरलेन सड़क निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार किसी भी भू-स्वामी को जबरन जमीन बेचने या सेल डीड कराने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि बेचने को तैयार नहीं है तो सरकार को उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम-2013 के तहत कानूनी प्रक्रिया अपनाकर ही भूमि का अधिग्रहण करना होगा।
यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज भाटिया और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने अनिल कुमार गुप्ता व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि देवीपाटन स्थित उनकी भूमि को बिना विधिक अधिग्रहण प्रक्रिया और उचित मुआवजा दिए परियोजना के लिए लेने का प्रयास किया जा रहा था।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि परियोजना के लिए लगभग 80 प्रतिशत भूमि सेल डीड के माध्यम से खरीदी जा चुकी है और करीब 100 रजिस्ट्रियां हो चुकी हैं। हालांकि कुछ भू-स्वामियों से सहमति नहीं बन सकी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि वे प्रस्तावित कीमत पर अपनी जमीन बेचने के इच्छुक नहीं हैं और उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध जमीन बेचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यदि सहमति नहीं बनती है तो सरकार को कानून के अनुसार भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनानी होगी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जो भू-स्वामी स्वेच्छा से अपनी जमीन बेचना चाहते हैं, उनके लिए यह आदेश बाधक नहीं होगा।
उधर, उप जिलाधिकारी राकेश कुमार जयंत ने बताया कि न्यायालय के आदेश का पूरी तरह पालन किया जाएगा। प्रभावित भूमि और भवनों का वर्तमान मूल्यांकन कर नियमानुसार मुआवजा तय किया जाएगा। उन्होंने बताया कि ओवरब्रिज का डिजाइन पहले ही बदला जा चुका है, जिससे परियोजना की लागत करीब 10 करोड़ रुपये बढ़ी है, लेकिन कई लोगों की जमीन बच गई है। जो लोग स्वेच्छा से बैनामा कराना चाहते हैं, वे तहसील पहुंचकर प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।
