भारत-नेपाल सीमा से जुड़े बलरामपुर जिले में 27 नेपाली नागरिकों को कथित तौर पर भारतीय पहचान दिलाने के मामले में जांच लगातार आगे बढ़ रही है। दोहरी नागरिकता के आरोप में सभी के खिलाफ कोतवाली जरवा में मुकदमा दर्ज किया गया है। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि वर्षों तक यह पूरा नेटवर्क कैसे संचालित होता रहा और इसमें किन लोगों की भूमिका रही।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि करीब 30 साल पहले इन लोगों के नाम सबसे पहले मतदाता सूची में दर्ज कराए गए। इसके बाद आधार कार्ड, राशन कार्ड, निवास, आय और जाति प्रमाण पत्र जैसे विभिन्न सरकारी दस्तावेज बनवाकर उनकी भारतीय पहचान स्थापित की गई।
जांच टीम वर्ष 1990 से 2016 के बीच तैयार हुए सभी रिकॉर्ड और दस्तावेजों का सत्यापन कर रही है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि किन अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों या अन्य स्थानीय लोगों की मदद से सरकारी अभिलेखों में इनके नाम दर्ज हुए और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिला।
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पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने बताया कि मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है। दस्तावेजों और साक्ष्यों का गहन परीक्षण जारी है। जांच में जिन भी लोगों की संलिप्तता सामने आएगी, उनके खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।
